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मुसाफ़िर

By Mitali Bapat in Daily Musings
Updated 18:10 IST Mar 14, 2018

Views » 247 | 1 min read

आसमान को तलाशे
मुसाफ़िर बनते फिरे
मंज़िलों के ये सितारे
काश क़दमों में गिरे

है सफ़र मुश्किल तो क्या
राही भी ये कुछ कम नहीं
अजनबी है रास्ता पर
मंज़िल तो अपनी है सही

ठोकरों का ख़ौफ़ क्या उनको
बे बाक ही जो बहते है
ख़लिश और खलबली को भी
सुकून ही वो कहते है

तो मंज़िलों के वो सितारे
क्यों ना हासिल हो सके
आसमान की तमन्ना
ये मुसाफ़िर जो रखे |

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