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तलाश है

By Vijay Kumar Meghwal in Poems
Updated 13:38 IST Feb 04, 2026

Views » 2646 | 1 min read

अब तो रोते भी आंसु छुपाकर,

बनावटी हंसी हंस कर,

शिकायते बहुत है आपसे 

टाल देते है ये सोचकर,

कही आप नाराज हो जाओ हमसे

 

उजाले में हंसते हैं

अंधेरों में रोते है 

गमों की माला में 

हंसी के मोती पिरोते है 

 

कहने को तो यहां दुनिया के मेले है 

पर फिर भी हम यहां अकेले है 

ओरो के लिए महफिल की शान है 

पर हम अपनी ही महफिल में गुमनाम है 

 

मर तो कबके गए है

अब तो जिंदा लाश है 

इस भीड़ में किसी और की नहीं

बस हमे आपकी की तलाश है।

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